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वीरतोलीमहरुमा अजीब है लोकतंत्र की महासभा और लोकतंत्र के किरदार ताज़ा


आज जब देश के करोड़ोंकरोड़ मतदाता मतदान के अंतिम चरण के मुहाने पर है। संवैधानिक, संस्थायें निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन के मार्ग पर, ऐसे में अघोषित तंत्र की कर्त्तव्यनिष्ठा देखते ही बनती है। जो एक ऐसी सभा के साक्षी या सहयोगी बन उस संस्कृति और संस्कारों के चीरहरण के साक्षी या सहयोगी है। और मौन रह या तो ठहाके लगा रहे है और अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैऐसे सभासद या सहयोगियों को न तो कभी इतिहास माफ करेगा, न ही इस महान भू-भाग पर इस राष्ट्र की महान विरासत के वंशजों के रूप वाले समय में दर्दनाक भी होगा जय स्वराज