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सफलता के लिए धर्म रूपी सारथी का होना जरूरी है-मुनिश्री

ग्वालियर। सारे सदगुण आपके जीवन में क्यों न हो, कर्म पर शासन किसका है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। कर्म की आवश्यकता जीवन में है, इसमें कोई शक नही। लेकिन जीवन में वास्तविक सफलता पाने के लिए धर्मरूपी सारथी का साथ होना जरूरी है नही तो जीवन में पराजित हो जाएंगे। कोई कितना भी बदमाष क्यों न हो यदि वह भगवान का भजन करता है और उसका मार्ग सही है तो निश्चित ही वह सद्गति तक पहुंच जाएगा। यह विचार मुनिश्री विहसंत सागर महाराज ने बुधवार को उरवाई गेट स्थित श्री दिगंबर त्रिषलगिरी जैन मंदिर ग्वालियर से मंगल विहार के दौरान आशीवार्द वचन देते हुए व्यक्त किए। 
मुनिश्री ने कहा कि बुद्धि और विवेक का सारथी अहंकारी नही हो सकता। क्रिया में विवेक नहीं लगाएंगे और अहंकार की वृति लेकर उतरेगे तो चाहे कितने ही सद्गुणी क्यों न हों, सफल नही हो पाएंगे। जिस मोंक्ष मार्ग मिला जाता है। उसे मंजिल जरूर मिलती है। सही रास्ता न मिलने से इंसान भटक रहा है। हमें पर्यटक नहीं, तीर्थ यात्री बनना चाहिए। जैन धर्म सब धर्मो से इस तरह पृथक है कि इस धर्म में आत्मा को परमात्मा बनाने की साधना कराई जाती है। जैन धर्म मूल सिद्धांत यही है कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकती है। परमात्मा बनने का उपाय सत्य, अहिंसा, त्याग, संयम, महाव्रत, है। गुरू के बिना मुक्ति मार्ग शुरू नही होता है। 
मुनिश्री ने ग्वालियर से 13 किमी पदविहार कर नया गांव तक विहार किया       
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन आदर्ष कलम ने बताया कि मुनिश्री विहसंत सागर महाराज एवं मुनिश्री विष्वसूर्य सागर महाराज ने आज बुधवार को उरवाई गेट से गुडागुडी नाक जैन मंदिर पर आहारचार्य के उपरांत दोपहर में गुडा गुडी जैन मंदिर से पदविहार कर नया गांव विश्राम गेस्ट हाउस पर 13 ंिक.मी चलकर पहुचें। मुनिश्री का पद विहार में विपुल जैन, प्रवक्ता सचिन जैन आदर्ष कलम, अरविद मोदी, जितेंद्र जैन, कमल जैन, अजीत जैन, अकिंत जैन, मंयक जैन, शुभम जैन ने ग्वालियर से मंगल विहार कराया। गुरूवार को मुनिश्री पनिहार जैन मंदिर पहुचकर आहारचार्य सपंन्न होगी।