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तानसेन को वैश्विक बनाने की उधेड़बुन 

संगीत सम्राट तानसेन की समाधि पर होने वाला संगीत समारोह कब और कैसे विश्व संगीत समारोह हो गया हमें नहीं मालूम लेकिन हम तानसेन समारोह को विश्व समारोह बनाये जाने से खुश नहीं हैं।तानसेन समारोह सौ साल से अधिक पुराना समारोह है। सरकारी आंकड़े इससे अलग हैं, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत समारोह के साथ जितने प्रयोग मध्यप्रदेश के नौकरशाहों ने किये हैं उन्हें देखकर यदि आज तानसेन होते तो शायद ख़ुशी से नाच उठने के बजाय, वे गाना भूल जाते ।
तानसेन समारोह के साथ मेरा जुड़ाव भी बीते 45  साल से है। मेरा सौभाग्य है कि एक रसिक श्रोता के रूप में मैंने इस समारोह के मंच से देश के अनेक शीर्षस्थ संगीतज्ञों को न सिर्फ रूबरू सुना है बल्कि उनसे बातचीत भी की है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस राष्ट्रीय समारोह को नौकरशाहों ने अंतर्राष्ट्रीय बनाने की मुहिम छेड़ रखी है। ठेठ भारतीय संगीत समारोह में दुनिया के अलग-अलग देशों के संगीतज्ञों को बुलाकर उनकी प्रस्तुतियां कराई जा रही हैं और देश के स्वनामधन्य संगीतज्ञ समारोह में शामिल होने के इन्तजार में बूढ़े होते जा रहे हैं। हालाँकि मुझे ये मानने में कोई उज्र नहीं है कि संगीत सीमाओं से परे होता है किन्तु मैं ये भी मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि भारीतय शास्त्रीय संगीत के पावन मंच को प्रयोगों के नाम पर संगीत का घल्लू-घारा  मंच बना दिया जाये ।
बीते कुछ वर्षों से तानसेन समारोह के आयोजन में भव्यता लगातार बढ़ रही है लेकिन संगीत का स्तर लगातार गिर रहा है।  संगीत की राजनीति ने इस शानदार आयोजन की आत्मा को कुचलना शुरू कर दिया है । श्रोता की समारोह से क्या अपेक्षा है इस पर किसी का ध्यान नहीं है, सब प्रयोग करने में लगे हैं और दुर्भाग्य ये है कि समारोह में मंच हासिल करने की चाहत के चलते कोई इन प्रयोगों का खुलकर विरोध भी नहीं कर पा रहा। कोई नहीं कह पा रहा कि -आपको यदि विश्व संगीत का प्रदर्शन ही करना है तो अलग से कराइये उसे तानसेन समारोह के साथ गड्डमड्ड मत कीजिये ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के अपने तौर तरीके हैं ।अपना व्याकरण है,अपनी परम्पराएं हैं,अपनी बैठक पद्यति है,अपनी वेश भूषा है, अपनी शास्त्रीयता है उसे विश्व संगीत के साथ मिलाकर नष्ट नहीं किया जा सकता। हमारे संगीतज्ञ अपने श्रोताओं के सामने मंच पर पालथी मारकर बैठते हैं,उनकी आँखों में आँखें डालकर गाते-बजाते हैं, विदेशी संगीतज्ञों का अपना तौर-तरीका है ,अपना व्याकरण है, उसका भारतीय शास्त्रीय संगीत के श्रोताओं से कोई तादात्म्य बैठता ही नहीं है। वे कुर्सियों पर बैठते हैं, विदेशी संगीतज्ञों की प्रस्तुतियों को झेलना और उनके वर्ण पर जबरन तालियां बजाना श्रोताओं की विवशता है ।
तानसेन समारोह को अब आयोजक टीवी शो बनाने पर आमादा हैं। संगीतज्ञों का प्रस्तुति समय बाँध दिया गया है, इस कारण शास्त्रीय संगीत से उन्मुक्तता नदारद हो चली है ।पूर्व में संगीतज्ञ को उन्मुक्त होकर बजने की आजादी थी।मैंने इसी समारोह में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब,पंडित रवि शंकर जी, श्रीमती गंगू बाई हंगल और पंडित भीम सेन जोशी को अर्ध रात्रि से भोर तक गाते -बजाते सुना है और मैंने ही बीते साल स्वर्गीय गुंदेचा को 45  मिनिट में मंच छोडऩे पर मजबूर होते भी देखा है ।आखिर ये सब क्या है, क्यों है ? क्यों एक शानदार समारोह के साथ खिलवाड़ की जा रही है ।
तानसेन समारोह की स्थानीय समिति की बैठक में स्थानीय मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर की ये आपत्ति काबिले गौर थी कि इस समूचे आयोजन के सारे फैसले भोपाल में क्यों किये जाते हैं? स्थानीय समिति क्या सिर्फ देखने के लिए है ? आपको याद होगा कि कुछ वर्षों पहले भाजपा शासन में तानसेन समारोह को तानसेन की समाधि स्थल से हटाकर बैजाताल में करने की धृष्टता की गयी थ,उस समय मैंने अपने मित्रों के साथ आंदोलन कर उस निर्णय को  बदलवाया था, लेकिन आज तानसेन समारोह को विश्व समारोह बनाने की जिद में बर्बाद करने का प्रयास किया जा रहा है किन्तु कोई बोलने को तैयार नहीं है !तानसेन समारोह को आज भी पहले जैसी उन्मुक्तता और सुचिता की दरकार है । कृपाकर इस समारोह को प्रयोगशाला बनाने से रुकवाइये। हम विदेशी संगीतज्ञों की साधना और निष्ठा को लेकर बिल्कुल शंकित नहीं हैं किन्तु उनके लिए तानसेन समारोह का मंच साझा करने में आपत्ति है।
तानसेन समारोह की प्रतीक सभा में पहले की भांति अंतिम प्रस्तुति  देश के वरिष्ठतम संगीतज्ञ के लिए आरक्षित होना चाहिए।कलाकार पर समय की सीमा का बंधन हटाना चाहिए और देश के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय शास्त्रीय संगीत की साधना करने वाले कलाकारों को आमंत्रित किया जाना चाहिए फिर चाहे वे पूर्व के हों या पश्चिम के, उत्तर के हों या दक्षिण के। हमारे पास देश में ही इतने कलाकार हैं कि हमें विदेशी संगीतज्ञों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। मुझे पता है कि मै नक्कारखाने में तूती बजा रहा हूँ ,उसे नहीं सुना जाएगा किन्तु मेरा काम मै काम कर रहा हूँ ,क्योंकि मुझे ऐसा करना जरूरी लगता है ।
राकेश अचल
वरिष्ठ पत्रकार